इक पल में इक सदी का मज़ा हमसे पूछिये

इक पल में इक सदी का मज़ा हमसे पूछिये,

दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हमसे पूछिये।

भूलें हैं रफ्ता-रफ्ता उन्हें मुद्दतों में हम,

किश्तों में ख़ुद-खुशी का मज़ा हमसे पूछिये।

आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए,

अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हमसे पूछिये।

जलते दीयों में जलते घरों जैसी जौ* कहाँ,

सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिये।

वो जान ही गए कि हमें उनसे प्यार है,

आंखों की मुख़बिरि का मज़ा हम से पूछिये।

हंसने का शौक़ हमको भी था आप की तरह,

हंसिये मगर हंसी का मज़ा हम से पूछिए।

हम तौबा कर के मर गए बेमौत ऐ ख़ुमार,

तौहीन-ए-मयकशी का मज़ा हम से पूछिए।

हो आपको मुबारक़ सदी भर की ज़िंदगी,

हर पल में इक सदी का मज़ा हमसे पूछिये।

 

*जौ= रोशनी, प्रकाश

(Originally composed by Khumaar Barabankawi and appended by me)